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बुधवार, 23 सितंबर 2009

मैं इसी शहर में हूँ

मुझ से ग्लानि का बोझ सहा ना जाएगा  
तुम मुझे कभी `मसीहा´ मत कहना  
मैं भीड़ में खड़ा होकर चिल्ला लुँगा 
मुझे मंच पर आने को मत कहना  
इस यंत्राणा में भी मैं मुस्करा लेता हूँ 
मुझे कहकहा लगाने को मत कहना  
उनके जज्बातों को ठेस बहुत पहुँचेगी  
मैं इसी शहर में हूँ उनसे मत कहना


11 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बडिया शुभकामनायें आप इस शहर मे हों और उन्हें पता ना चले ये कैसा मज़ाक है?

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  2. इस यंत्राणा में भी मैं मुस्करा लेता हूँ
    मुझे कहकहा लगाने को मत कहना

    बहुत ही अच्छी रचना.गहराई से बात कहती हुई.

    हार्दिक आभार.

    चन्द्र मोहन गुप्त
    जयपुर
    www.cmgupta.blogspot.com

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  3. बहुत शानदार...अद्भुत और क्या कहूं।

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  4. उनके जज्बातों को ठेस बहुत पहुँचेगी
    मैं इसी शहर में हूँ उनसे मत कहना

    सुभानाल्लाह ......!!

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  5. उनके जज्बातों को ठेस बहुत पहुँचेगी
    मैं इसी शहर में हूँ उनसे मत कहना

    भाई यह तो मुश्किल शर्त रख दी आपने..बहुत खूब

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  6. आप इस शहर में हों तो चाहने वालों को अहसास हो ही जाता है कि कोई अपना है जो आस-पास ही है, चाहे आप बतायें, चाहें ना जतायें।
    पहली बार ही आना हुआ आपके ब्लॉग पर। बहुत सुन्दर रचनायें है यहां तो।
    ॥दस्तक॥

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  7. उनके जज्बातों को ठेस बहुत पहुँचेगी
    मैं इसी शहर में हूँ उनसे मत कहना

    खूबसूरत शेर ........... मासूम एहसास है इस रचना में ....... लाजवाब

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  8. kitni achche tareeke se aapne kaha hai...
    bhavon ko shabdon ki mala me goothna koi apse seekhe

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  9. "maiN isi shehar meiN hooN
    unse mt kehnaa..."

    jazbaat ke toofaan ko bayaan
    karti hui bahut achhee rachnaa .

    ---MUFLIS---

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  10. धन्यवाद् विपिन जी....आपकी रचनाओ में जो गहराई है वहां तक पहुँचने में तो शायद मेरा ये जीवन लग जाएगा

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