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शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2009

जिंदगी का उलाहना

जिंदगी मुझको उलाहना दे रही है  
कुछ घाव जो पाले थे मैंने अपनों की तरह 
दर्द वो अब देते नहीं बेगानों की तरह  
किस तरह होगी बसर कुछ समझ आता नहीं  
पर जिंदगी का उलाहना भी तो भाता नहीं  
राह के हर पत्ते पर तेरा नाम लिख कर 
स्याह रातों में अक्सर चिल्लाया तेरा नाम लेकर  
आस की भी उम्र अब तो ढल चुकी है  
जिंदगी अब खुद उलाहना बन चुकी है


:)

12 टिप्‍पणियां:

  1. राह के हर पत्ते पर तेरा नाम लिख कर
    स्याह रातों में अक्सर चिल्लाया तेरा नाम लेकर
    आस की भी उम्र अब तो ढल चुकी है
    जिंदगी अब खुद उलाहना बन चुकी है

    waah bahut khoob....!!

    Imroz ji ne mohabbat bhari isi zindagi ko jine ka falsafa btaya hai ....!!

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  2. आस की भी उम्र अब तो ढल चुकी है
    जिंदगी अब खुद उलाहना बन चुकी है
    bahut hi badhiyaa

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  3. JINDGI JO NA KARAAYE KAM HAI ..... APNE BAHOOT KHOOB LIKHA HAI ... SACH MEIN KABHI KABHI JIVAN MEIN UDAASI AA JAATI HAI US VAQT AISA HI HOTA HAI .......

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  4. कितनी सार्थक अभिव्यक्ति !
    बहुत सुंदर !जिन्दगी उनके देखते ही देखते उलाहना बन गई !
    बहुत सुंदर अनुभूति !!!

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  5. जिंदगी मुझको उलाहना दे रही है
    कुछ घाव जो पाले थे मैंने अपनों की तरह ...yeh line dil ko chhoo gayi...........

    ---------------------------

    apke comment ka bahut dhanyawaad.........

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  6. राह के हर पत्ते पर तेरा नाम लिख कर
    स्याह रातों में अक्सर चिल्लाया तेरा नाम लेकर

    बहुत ही खूबसूरत पंक्तियां लाजवाब प्रस्‍तुति ।

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  7. आस की भी उम्र अब तो ढल चुकी है ----
    बहुत खूब।।

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  8. क्या बात है साहब, घावों को भी अपना बना लिया, वाह! बहुत ही सुन्दर बात कही आपने

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  9. बहुत सुन्दर रचना । आभार

    ढेर सारी शुभकामनायें.

    SANJAY
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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