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रविवार, 17 अप्रैल 2011

तेज़ धूप का सफ़र

छाँव का सुकून 
मर्ग मरीचिका बन 
छलता रहा 
तेज़  धूप का सफ़र 
चलता रहा 
इस तपिश में 
ये कौनसी कशिश है
क्या सोच कर ये फूल 
बंजर में खिलता रहा 
होंठ कांपे तो थे 
मुझे रोकने को मगर
मुंह से तुम्हारे 
अलविदा निकला




5 टिप्‍पणियां:

  1. के बारे में महान पोस्ट "तेज़ धूप का सफ़र"

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  2. I really appreciate your skilled approach. These square measure items of terribly helpful data which will be of nice use on behalf of me in future.

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